By: Bhopalmahanagar
18-03-2019 08:50

शुक्रवार को न्यूजीलैंड में अब तक का सबसे खौफनाक आतंकी हमला हुआ। क्राइस्टचर्च की दो मस्जिदों अलनूर और लिनवुड में 28 साल के ब्रेटन टैरंट नाम के शख्स ने अंधाधुंध गोलियां बरसाईं, जिसमें कम से कम 50 लोगों की मौत हो गई और इतने ही घायल हैं। टैरंट ब्रिटिश मूल का आस्ट्रेलियाई नागरिक है और बताया जा रहा है कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विचारों से प्रेरित है। हमले के पहले ब्रेंटन टैरेंट के नाम से चल रहे सोशल मीडिया अकाउंट पर एक लंबी पोस्ट भी लिखी गई थी। जिसमें नस्लीय टिप्पणियां थीं। इस पोस्ट के बाद ही मस्जिद पर हमला किया गया। इस पोस्ट को द ग्रेट रिप्लेसमेंट के तौर पर देखा जा रहा है। आपको बता दें कि द ग्रेट रिप्लेसमेंट मुहावरा फ्रांस से आया है और इसका इस्तेमाल यूरोप में बाहर से आकर बसे लोगों के खिलाफ नारे के तौर पर अतिवादी लोग करते हैं। टैरंट ने ट्रंप को श्वेत पहचान और साझा उद्देश्य का प्रतीक बताया है। उसने लिखा है, आक्रमणकारियों को दिखाना है कि हमारी भूमि कभी भी उनकी भूमि नहीं होगी। वे कभी भी हमारे लोगों की जगह नहीं ले पाएंगे। उसका मानना है कि यूरोपीय लोगों की संख्या हर रोज कम हो रही है इसलिए यूरोपीय लोगों को अपनी जन्मदर बढ़ाने की जरूरत है वरना वे अपनी ही जमीन पर अल्पसंख्यक हो जाएंगे। ये सारी बातें भले सुदूर न्यूजीलैंड से सामने आई हैं, लेकिन अपने देश में भी अब अक्सर सुनने मिलती हैं। 

टैरंट की ये बातें दर्शाती हैं कि वह किस कदर नस्लीय श्रेष्ठता के दंभ और घृणा से भरा है, उसे शायद अपने किए का कोई अफसोस भी नहीं है इसलिए शनिवार को जब पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, तब भी वह कैमरे के सामने मुस्कुरा रहा था। टैरंट की सोच और उसका काम जितना भयावह है, उतना ही भयावह उसका तरीका भी है। शुक्रवार को वह हथियारों से भरी कार लेकर मस्जिद पहुंचा और बच्चों, महिलाओं और पुरुषों पर पांच मिनट तक गोली दागता रहा, दुनिया को दिखाने के लिए सिर पर लगे कैमरे से उसमें फेसबुक पर लाइव-स्ट्रीम शुरू कर दी थी, इसी फुटेज से उसकी पहचान भी हुई। आतंकवाद को धर्म के चश्मे से देखने वाले अक्सर इस्लाम को कट्टरपंथ से जोड़कर देखने लगे हैं। अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद यह अवधारणा और पुष्ट हो गई है। अमेरिका में जिस तरह मुस्लिमों के साथ या दाढ़ी और पगड़ी पहने लोगों के साथ भेदभाव भरा व्यवहार होने लगा, वह इस बात का प्रमाण है।

लेकिन न्यूजीलैंड की घटना के लिए कौन से धर्म को जिम्मेदार ठहराया जाएगा? यह बात समझनी और समझानी होगी कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता है, न ही कोई धर्म नफरत या हिंसा की सीख देता है। धर्म की आधी-अधूरी व्याख्या करने वाले लोग अपनी सुविधा और राजनैतिक लाभ के लिए एक कौम को दूसरी कौम से लड़ाते हैं। जब इंसान सभ्यता का पाठ पढ़ रहा था, तब भी ऐसी साजिशें सत्ता के लिए होती थीं और अब भी खेल वही है। टैरंट जैसे लोग इस खेल में मोहरे बन जाते हैं। अमेरिका फर्स्ट का नारा देने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने न्यूजीलैंड में हुए हमले की निंदा तो की, लेकिन वे अब भी नहीं मानते हैं कि दुनिया में श्वेत राष्ट्रवाद एक बढ़ती समस्या है। उनका कहना है कि यह कुछ लोगों का छोटा सा समूह है। लेकिन ट्रंप शायद इस घटना के पीछे के व्यापक परिदृश्य को जानबूझकर अनदेखा कर रहे हैं। इस वक्त दुनिया भर में दक्षिणपंथ जोर पकड़ रहा है।

भाषायी, जातीय, नस्लीय अस्मिता के सवाल को प्रमुख बनाकर आम आदमी के जीवन से जुड़ी जरूरी समस्याओं को गौण बना दिया जा रहा है। गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, बीमारी से उपजी हताशा और गुस्से को धर्मांधता की गलियों में भटकाया जा रहा है और इन सबके बीच दुनिया के चंद अमीर लोग अपनी रईसी में लगातार बढ़ोत्तरी कर रहे हैं। एक वक्त में भूमंडलीकरण का हिमायती यूरोप भी अब पूंजीवाद के इस खेल का शिकार बन चुका है। वहां अमीरी-गरीबी की खाई बढ़ चुकी है और इसे पाटने के लिए चरमपंथ को आगे किया गया है। नतीजा यह है कि एशियाई-अफ्रीकी देशों से गए लोगों को वहां के मूल निवासी अपनी तकलीफों का जिम्मेदार मानने लगे हैं। उन्हें लगता है कि प्रवासियों के कारण उनके लिए रोजगार, शिक्षा, व्यापार आदि के अवसर घट रहे हैं। इसलिए इन देशों में प्रवासियों के खिलाफ माहौल बन रहा है।

दक्षिणपंथ और राष्ट्रवाद से उपजी कट्टरता मानवता के लिए कितनी घातक साबित हो सकती है, इसका एक उदाहरण दूसरे विश्वयुद्ध में दुनिया ने देखा है और अब एक भयानक उदाहरण न्यूजीलैंड से सामने आया है। इस तरह की घटना से लगता है कि हिटलर मर गया, हिटलर जिंदा है। 
 

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