By: Bhopalmahanagar
23-03-2019 08:15

बिलासपुर। बिलासपुर लोकसभा सीट भाजपा के लिए जहां अभेद गढ़ साबित हो रही है, वहीं कांग्रेस के लिए यह चुनौती बनती जा रही है। बीते 25 वर्षों से इस सीट को अपने कब्जे में करने कांग्रेस जोर आजमाइश कर रही है। विधानसभा चुनाव में जिस तरह सत्ता परिवर्तन का जोर चला और बदलाव का राजनीतिक मुद्दा हावी रहा उसके बाद कांग्रेस के लिए यहां एक उम्मीदर नजर आ रही है। कांग्रेस ने अटल श्रीवास्तव को यहां से अपना उम्मीदवार बनाया है।

49 सवाल के अटल मूलत: बिलासपुर के ही रहने वाले हैं और सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। उन्हें आरटीआई एक्टिविस्ट के तौर पर भी जाना जाता है। विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने टिकट के लिए दावेदारी रखी थी।

इससे पहले उन्होंने बिलासपुर के नेहरू नगर वार्ड से पार्षद का चुनाव लड़ा था, लेकिन उसमें वे हार गए थे। अटल ने साल 2018 में असपा बचाव पदयात्रा का प्रतिनिधित्व किया था। इसके अलावा वे राहुल गांधी के करीबी भी माने जाते हैं। राहुल गांधी की साल 2015 में किसान पद यात्रा और अन्य यात्रा में उन्होंने बतौर इंचार्ज काम किया था।

ऐसा है बिलासपुर का राजनीतिक समीकरण

बिलासपुर लोकसभा का चुनावी इतिहास अगर देखें तो वर्ष 1951 से लेकर वर्ष 2014 के बीच यहां प्रत्याशी की छवि को मतदाताओं ने बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं दी। परंपरागत मतदाताओं के साथ स्वींग वोटरों की सहभागिता हमेशा से ही इस सीट पर दिखाई देती रही है।

बिलासपुर लोकसभा सीट से जिन लोगों ने प्रतिनिधित्व किया है उनमें दो या तीन नामचीन चेहरों को अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो उम्मीदवार के बजाय मतदाताओं ने पार्टी के प्रतिबद्धता के चलते प्रत्याशियों को जीताकर दिल्ली भेजते रहे हैं। वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

यहां का चुनावी इतिहास

भाजपा ने साल 2014 में लखनलाल साहू को यहां अपना उम्मीदवार बनाया था। कांग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री व भारत रत्न स्व.अटलबिहारी वाजपेयी की भतीजी कस्र्णा शुक्ला को चुनाव मैदान में उतारा था। तब करुणा भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता व उपाध्यक्ष पद छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुई थीं।

लखनलाल के सामने वह न केवल बड़ा नाम थीं साथ ही एक बड़ा चेहरा भी, लेकिन एक लाख 76 हजार वोटों के अंतर से वे चुनाव हार गईं। मोदी लहर में मतदाताओं ने व्यक्ति की छवि की बजाय पार्टी को तवज्जो दी। वर्ष 1951 से 1991 तक इस सीट से अलग-अलग पार्टी के सांसदों ने लोकसभा में प्रतिनिधित्व किया।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय लोकदल, इंदिरा कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशी चुनाव जीतकर संसद पहुंचते रहे हैं। 40 साल तक यहां के मतदाताओं ने अलग-अलग पार्टी के प्रत्याशियों को चुनाव जीतकर न केवल राजनीतिक दल वरन जीतने वाले उम्मीदवार की कड़ी परीक्षा लेते रहे हैं। वर्ष 1996 से 2014 तक भाजपा की जड़ें इस सीट में इतनी मजबूत हो गई कि यह भाजपा का गढ़ बन गया।

मोहले के नाम कीर्तिमान

पुन्नूलाल मोहले के नाम बिलासपुर लोकसभा सीट से लगातार चुनाव जीतने का कीर्तिमान है। वर्ष 1996 से 2004 तक वे लगातार चार बार यहां से सांसद रहे। वर्तमान में वे मुंगेली विधानसभा क्षेत्र से लगातार दूसरी बार चुनाव जीते हैं।

इसके पहले जरहागांव विधानसभा से वे दो बार विधायक चुने गए थे। मोहले छत्तीसगढ़ राजनीति के ऐसे अपराजेय योद्धा हैं जिन्होंने आज तक एक भी चुनाव नहीं हारा है। भाजपा आज अपनी अगली सूची जारी करने जा रही है। अनुमान लगाया जा रहा है कि मोहले एक बार फिर यहां से भाजपा उम्मीदवार हो सकते हैं।

आंकड़ों में बिलासपुर लोकसभा सीट 

1951 - रेशम लाल जांगड़े कांग्रेस 

1957 - रेशम लाल जांगड़े कांग्रेस

1962 - सत्यप्रकाश आइएनडी

1967 - अमर सिंह कांग्रेस

1971 - रामगोपाल तिवारी कांग्रेस

1977 - निरंजन प्रसाद केशरवानी भारतीय लोकदल

1980 - गोदिल प्रसाद अनुरानी कांग्रेस

1984 - खेलनराम जांगड़े कांग्रेस

1989 - रेशम लाल जांगड़े भाजपा

1991 - खेलन राम जांगड़े कांग्रेस

1996 से 2004 तक पुन्नूलाल मोहले भाजपा

2009 - दिलीप सिंह जूदेव भाजपा

2014 - लखनलाल साहू भाजपा
 

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